डॉ. एस.आर. कुमावत का शोध पत्र " एन्थ्रोपोजेनिक इम्पैक्ट ऑन विजिटेशन स्ट्रक्चर ऑफ द अरावली हिल्स" अंतर्राष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित
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सद्दाम रंगरेज, प्रधान संपादक | Mon, 19-Jan-2026 |
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कुचामनसिटी(नागौर डेली न्यूज) : मारवाड़ पी.जी. महाविद्यालय, कुचामन सिटी के प्राचार्य एवं पर्यावरण विज्ञान के वरिष्ठ विशेषज्ञ डॉ. एस. आर. कुमावत का शोध पत्र “एन्थ्रोपोजेनिक इम्पैक्ट ऑन विजिटेशन स्ट्रक्चर ऑफ द अरावली हिल्स ” यू.के. लन्दन के प्रतिष्ठित ग्रीनफ़ील्ड एडवांस रिसर्च पब्लिसिंग हाउस के अंतर्राष्ट्रीय शोध जर्नल इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ एडवांस रिसर्च इन इन्जिनीरिंग एंड एप्लाइड साइंस के वॉल्यूम -14 में प्रकाशित हुआ है।
इस शोध में अरावली पर्वत श्रृंखला की वनस्पति संरचना पर मानवीय गतिविधियों जैसे शहरीकरण, खनन, कृषि विस्तार एवं अन्य मानव हस्तक्षेपों के प्रभावों का वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। शोध पत्र के द्वारा अरावली क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता प्रबंधन एवं सतत विकास की दिशा में महत्वपूर्ण निष्कर्षों को भी सम्मिलित किया गया हैं। डॉ. कुमावत के इस शोध को अकादमिक एवं पर्यावरणीय दृष्टि से एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
शोध सर्वेक्षणों और रिमोट सेंसिंग विश्लेषण से प्राप्त निष्कर्षों से अरावली पहाड़ियों में देशी वनस्पतियों की भारी नुकसान का पता चला है। खनन गतिविधियों, से विशेष रूप से अलवर और सीकर जैसे क्षेत्रों में, वनों के बड़े-बड़े हिस्से, विशेषकर शुष्क पर्णपाती और झाड़ीदार वनस्पतियों का नुकसान हुआ है। सेटेलाइट इमेज के अध्ययन से पता चलता है कि 2000 और 2020 के बीच अरावली वन क्षेत्र में तीस प्रतिशत की कमी आई है,जो मुख्य रूप से खनन और शहरी अतिक्रमण के कारण हुई है। इसके अतिरिक्त, जिन क्षेत्रों में कभी स्थानीय वनस्पति प्रजातियाँ सघन स्थिति में थीं, उनकी जगह प्रोसोपिस जुलिफ्लोरा और लैंटाना कैमारा जैसी वनस्पति प्रजातियों ने ले ली है I
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण निर्णय के पश्चात अरावली पर्वत श्रृंखला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी रही है। राजस्थान की पारिस्थितिक संतुलन व्यवस्था में अरावली पर्वतमाला को संजीवनी के रूप में माना जाता है, जो जल संरक्षण, जैव विविधता एवं पर्यावरणीय स्थिरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। राजस्थान के लिए अरावली न केवल प्राकृतिक धरोहर है, बल्कि पर्यावरणीय संरक्षण की दृष्टि से यह राज्य की जीवनरेखा के रूप में कार्य कर रही है। इस शोध प्रकाशन ने शोध-परिदृश्य को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सशक्त किया है, जिसे अकादमिक एवं पर्यावरणीय दोनों दृष्टियों से एक विशिष्ट उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।